एससी-एसटी एक्ट में गिरफ्तारी करने वाले टीआई पर कार्रवाई के आदेश

ग्वालियर। 
मोहना थाना प्रभारी को एससी-एसटी एक्ट में सोनू उर्फ कासिम खान (24) को गिरफ्तार करना महंगा पड़ गया। विशेष सत्र न्यायाधीश बीपी शर्मा ने पुलिस की ओर से एक्ट में आरोपी की गिरफ्तारी के बताए तीनों कारणों को आधारहीन मानते हुए एसएसपी को मोहना थाना टीआई एचएल प्रजापति के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश दिए हैं। साथ ही कोर्ट ने सोनू की गिरफ्तारी को अमान्य कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट को लेकर बनाई नई गाइड लाइन के उल्लंघन का संभवत: पहला ऐसा केस है, जिसमें पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया और उसे न्यायिक हिरासत में भेजने के लिए कोर्ट से निवेदन किया था।

जगदीश ने मोहना थाने में एक आवेदन दिया कि सोनू खान ने उसके साथ लात-घूसों से मारपीट की और जाति सूचक गालियां दीं। पुलिस ने सोनू के खिलाफ 23 अप्रैल 2018 को धारा 323, 294, 506 व एससी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया और एसएसपी से अनुमति लेने का हवाला देकर उसी दिन गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस ने केस डायरी के साथ सोनू को विशेष सत्र न्यायालय में पेश किया। केस डायरी में बताया गया कि एसएसपी से उसकी गिरफ्तारी की इजाजत ली गई है। उसके बाद गिरफ्तार किया है। केस डायरी के साथ सोनू को 5 मई 2018 तक न्यायिक हिरासत में भेजने के लिए आवेदन भी पेश किया।

कोर्ट ने पुलिस की केस डायरी व आवेदन का अवलोकन किया। पुलिस ने केस डायरी में गिरफ्तारी के जो कारण बताए थे, उन्हें कोर्ट ने आधारहीन माना। विशेष सत्र न्यायालय ने माना कि थाना प्रभारी ने सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन का उल्लंघन कर गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार करने वाले थाना प्रभारी एचएल प्रजापति के खिलाफ एसएसपी अनुशासनात्मक कार्रवाई करें।

पुलिस ने गिरफ्तारी के बताए थे यह कारण, कोर्ट ने किए खारिज

1- पुलिस : आरोपी अन्वेषण को प्रभावित कर सकता है। साक्ष्य भी नष्ट कर सकता है। अपराध की पुर्नावृत्ति रोकनी है। जबतक जांच पूरी नहीं होती है आरोपी को 5 मई तक न्यायिक हिरासत में भेजा जाए।

– कोर्ट : अन्वेषण में आरोपी से कोई माल या वस्तु बरामद नहीं होनी है। सिर्फ गालियां दी गई हैं। ऐसी स्थिति में अन्वेषण प्रभावित नहीं हो सकता है।

02- पुलिस : आरोपी को छोड़ दिया जाता है तो वह जांच में सहयोग नहीं करेगा। यानी थाने पर बुलाए जाने पर उसकी उपस्थिति सुनिश्चित नहीं होगी।

कोर्ट : आरोपी मोहना का ही रहने वाला है। उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। अन्वेषण के दौरान उसकी उपस्थिति आवश्यक नहीं है।

03- पुलिस : फरियादी व आरोपी अलग-अलग धर्मों के हैं। सांप्रदायिक माहौल न बिगड़े। इसलिए गिरफ्तारी की गई है।

कोर्ट: आरोपी व फरियादी अलग धर्मों के हैं। यह गिरफ्तारी का आधार नहीं हो सकता है।

आरोपी की गिरफ्तारी को नहीं किया स्वीकार

धारा 323, 294, 506 जमानती हैं। इन धाराओं में जो भी केस दर्ज होता है, उनमें आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। एससी-एसटी एक्ट संघेय अपराध में आता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की नई गाइड लाइन में गिरफ्तारी की बजाए जांच जरूरी है। इसके चलते कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में आरोपी की गिरफ्तारी अस्वीकार कर दी।

यह तीन व्यवस्थाएं की सुप्रीम कोर्ट ने

– आम लोगों की गिरफ्तारी से पहले थाना प्रभारी को अपने पुलिस अधीक्षक से अनुमति लेना आवश्यक है। पुलिस अधीक्षक से अनुमति मिलने के बाद न्यायालय इस तथ्य पर विचार करेगा कि पुलिस अधीक्षक द्वारा गिरफ्तारी के दिए गए आदेश में पर्याप्त आधार हैं या नहीं, लेकिन मोहना थाना प्रभारी ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से जो अनुमति ली थी, उसमें आधार बताए थे कि आरोपी अन्वेषण को प्रभावित करेगा और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित नहीं होगी।

– लोक सेवक की गिरफ्तारी के लिए नियुक्ति प्राधिकारी की अनुमति आवश्यक है।

– निचली अदालत अग्रिम जमानत दे सकती है।

विशेष न्यायालय ने कराया था सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन से अवगत

विशेष सत्र न्यायाधीश (एट्रोसिटीज) बीपी शर्मा ने 21 मार्च 2018 को एससी-एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई नई गाइड लाइन के संबंध में पुलिस अधीक्षक अजाक को पत्र लिखा गया था,जिसमें नई गाइड लाइन के संबंध में अवगत कराया गया। साथ ही एसपी को अवगत कराया है कि एक्ट में आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी न की जाए। एसपी सुनिश्चित करें कि थानों में गाइड लाइन का पालन किया जा सके।

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