7 जून तो याद ही होगा आपको….

चलिए मैं याद दिलाने की कोशिश करता हु। जी हाँ 7जून वही काला दिन था ।जिस दिन बालाघाट के इतिहास में 26 लोगो की असमय मौत की इबारत लिख दी गई ।जिंदा जले इन मजदूर महिला पुरुषों के जिस्म के परखचे तक उड़ गए थे ।बन्द फेक्ट्री में विस्फोट और रोती बिलखती चीखें ।अपने आप को बचाने न जाने कितनी कवायदे की होगी उन लाचार बेबस मजलुमो ने ।उनकी चीख पुकार भी वही विस्फोट की आवाज तले दब गई ।जिसकी हम केवल कल्पना कर सकते है। कि क्या हुआ होगा ।किन्तु जानते तो वही है जो बताने के लिए इस दुनिया मे अब नही रहे ।बालाघाट का खैरी गांव 26 इंसानी मौतों का गवाह बन गया ।जहाँ फटाका फैक्टरी ने इन घरों के चिराग छीन लिए तो किसी के घर ही सुने कर दिये। आखिर क्यों हुआ ऐसा? किसका दोस था ?ट्रांसफर ,निलंबन, पुलिस कार्यवाही हो रही है ।और हुई भी ।आगे भी होगी ।शायद फटाका फैक्टरी संचालक कुछ समय के लिए जेल भी चले जाएं।जबकि कानूनी प्रक्रिया आप हम बेहतर जानते है ।किंतु क्या उन 26 लोगो को वापस लाया जा सकता है ?क्या फिरसे उजड़े घरों में रोशनी आ सकती है ?नही यह सम्भव नही है ।ट्रेंड चल पड़ा है हादसा घटनाओं पर त्वरित पीड़ितों को आर्थिक मदद उपलब्ध कराने का ।किन्तु यह सहानुभूति हो सकती है। वास्तविक जिम्मेदारी नही। जिम्मेदारी तो वह होती कि ये हादसा ही नही होने दिया जाता ।और न ही मौत का तांडव होता। आखिर जिम्मेदारी तय कौन करेगा ?शासन हो प्रशासन हो सभी जिम्मेदारी से क्यो भाग जाते है ।एक हादसे के बाद आगे सबक न लेना हमारी आदत में शुमार हो चुका है ।उसी का खामियाजा इंसानी मौतों के परिणाम के रूप में सामने आता है ।इतनी बड़ी फटाका फैक्टरी जो कि नियमावली के विरुद्ध चल रही थी। इसपर जिम्मेदार प्रशासनिक मसनरी ने अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से क्यो नही निभाई ? थोड़ा बहुत तो चलता रहता है कि कहावत यहाँ भी चरितार्थ होते दिखाई पड़ी ।इस प्रवर्ती ने थोड़ा बहुत नही बहुत कुछ कर दिया। बालाघाट मुख्यालय से खैरी गांव की दूरी भी न के बराबर है। फिर क्यो चूक हुई प्रसासन से? क्यो चूक हुई सम्बन्धित विभाग प्रमुखों से? क्या सबकुछ जानकर अनजान बने बैठे थे ये मौत के सौदागर ।या नियम विरुद्ध चल रही इस फैक्टरी को चलने में मौन स्वीकृति दी जा रही थी ?और ये मौन स्वीकृति भी दी गई तो किसलिए ? क्या मिला था इसके एवज में की समय समय पर फैक्टरी का निरीक्षण} तक नही किया गया ?क्योकि जो बातें सामने आई है वे तो यही साबित करती है कि जिले का प्रशासन धृतराष्ट बना बैठा था ।और यह फटाका फैक्टरी इंसानी मौतों की इबारत लिखने में लगी रही ।जिसका परिणाम आखिर में7 जून को बालाघाट का वह दिन काल इतिहास बन गया

फटाका फैक्टरी विस्फोट के सम्बन्ध में जो तथ्य सामने आए उन्हें सुनकर आप भी हैरान हो जाएंगे कि किस कदर फैक्टरी संचालक बे रोक टोक अपना काम किये जा रहा था ।जो कागज के टुकड़े कमाने की भूख में इंसानी जिंदगी को दांव पर लगा रहा था ।जानकारी के मुताबिक नियमावली के अनुसार 5 किलो बारूद की क्षमता वाली फैक्ट्री में 50 किलो पटाखे बनाये जा सकते है ।लेकिन इस फैक्टरी में पांच गुना बारूद तैयार कर पटाखे तैयार किये जाते थे। करीब 2 दर्जन से अधिक मजदूर इस फैक्ट्री में रोजाना करीब 2.5 हजार किलो वजन के पटाखे तैयार करता था। सवाल यह है कि ऐसा कैसे हो सकता है कि प्रशासन को इस कारोबार का पता ही ना हो। क्यों किसी अधिकारी ने इसकी जांच नहीं की।क्यो आखिर क्यों सवाल तो अभी भी खड़ा है ।
इसके अलावा यह भी जानकारी सामने आई कि फैक्टरी संचालक वाहिद वारसी 250 किलो बारूद से 2.5 हजार किलो पटाखे बनाता था जिसने अपने नेटवर्क भी अन्य राज्यो तक फैला रखा था वाहिद वारसी इन पटाखों को तीन राज्य मध्यप्रदेश, महाराष्ट, छत्तीसगढ, सप्लाई। करता था इस कदर व्यापक पैमाने पर फटाका सप्लाई की जाती रही। और इसकी कोई खोज खबर लेने वाला भी इस बालाघाट जिले में कोई नही था ।फलस्वरूप 26 लोगो के जिंदा जलकर मरने की दर्दनाक घटना जिले वासियों के सामने है ।किसका दोस है ?वाहिद वारसी का ?या इसपर शिकंजा कसने वाले जिम्मेदारों की लचर कार्यप्रणाली का ।जिनकी लापरवाही और ईमानदारी से नही की गई ड्यूटी ने 26 से भी अधिक इंसानी जिंदगी के परिवारों को रोते बिलखते छोड़ दिया आर्थिक मदद देने या अधिकारियों के ट्रांसफर कर देने से ये हादसे नही रुकने वाले ।बल्कि जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभा ले ऐसी व्यवस्था बने ।तब कही जाकर सिस्टम में लगी जंग को हटाया जा सकता है ।वरना फिर कोई फैक्टरी मौत का तांडव खेलने से परहेज नही करेगी।

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